अब तक केवल तीन देशों ने ही अपना स्पेस स्टेशन संचालित किया है। भारत चौथा देश बनने की योजना बना रहा है।
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन, या BAS, भारत की एक नियोजित ऑर्बिटल लेबोरेटरी है। पहले मॉड्यूल को मंजूरी मिल चुकी है, और ISRO का लक्ष्य 2035 तक इस स्टेशन को कक्षा में स्थापित करना है।
स्पेस स्टेशन किस लिए होता है?
स्पेस स्टेशन एक ऐसी लेबोरेटरी है जो सालों तक कक्षा में रहता है। क्योंकि यह स्थायी होता है, इसलिए प्रयोग कुछ दिनों के बजाय महीनों तक चल सकते हैं, और क्रू को बदला जा सकता है।
यह स्टेशन पृथ्वी से लगभग 400 किलोमीटर ऊपर कक्षा में घूमेगा, जहाँ अंतरिक्ष यात्री एक बार में 15 से 20 दिनों तक रुक सकेंगे।
- अंतरिक्ष में मानव शरीर कैसे बदलता है, इस पर शोध
- चिकित्सा और मैटेरियल्स साइंस में प्रयोग
- चंद्रमा पर उतरने के लिए भारत को जिन तकनीकों की जरूरत है, उनके लिए एक टेस्टबेड
- ऐसी स्किल्स विकसित करने की जगह जो केवल कक्षा में रहने से ही आती हैं
यह कैसा दिखेगा?
योजना 20 टन वजन वाले पांच मॉड्यूल के एक स्टेशन की है। पहले मॉड्यूल को BAS-01 कहा जाता है और इसे विस्तारित गगनयान कार्यक्रम के हिस्से के रूप में विकसित किया जा रहा है।
इसे कई सालों में, एक-एक करके मॉड्यूल जोड़कर कक्षा में असेंबल किया जाएगा।
भारत को इसकी जरूरत क्यों है?
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम उस मुकाम पर पहुँच गया है जहाँ अगला कदम इंसानों को अंतरिक्ष में भेजना है। किसी अंतरिक्ष यात्री को चंद्रमा पर भेजने का मतलब है पहले यह सीखना कि लंबे समय तक कक्षा में कैसे रहा और काम किया जाए।
एक राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन भारत को अपनी शर्तों पर, किसी दूसरे देश के हार्डवेयर पर निर्भर हुए बिना, खुद अपना अनुभव बनाने की जगह देता है।
यह गगनयान से कैसे जुड़ा है?
सब कुछ गगनयान पर निर्भर करता है, जो भारत की पहली मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान है। गगनयान के लिए विकसित किया जा रहा क्रू कैप्सूल, लाइफ-सपोर्ट सिस्टम और डॉकिंग तकनीक वही बुनियादी चीजें हैं जिनकी स्टेशन को जरूरत है।
भारत ने SpaDeX मिशन के साथ कक्षा में ऑटोनॉमस डॉकिंग का परीक्षण पहले ही कर लिया है, जिससे वह यह क्षमता दिखाने वाला चौथा देश बन गया है।
यह कब होगा?
पहले मॉड्यूल का लक्ष्य लगभग 2028 है, और पूरे स्टेशन की योजना 2035 तक बनाई गई है। दोनों ही तारीखें गगनयान के पहले सफलतापूर्वक उड़ान भरने पर निर्भर हैं।








