अब तक भारत ने जो भी मून मिशन भेजे हैं, वे सभी वन-वे रहे हैं। चंद्रयान-4 इस बात को बदल देगा। इसे इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि यह चाँद पर लैंड करेगा, वहाँ की मिट्टी और चट्टानों के सैंपल लेगा, और उन्हें वापस धरती पर ले आएगा।
अगर यह सफल होता है, तो भारत अमेरिका, सोवियत संघ और चीन के साथ उन चुनिंदा देशों की कतार में शामिल हो जाएगा जिन्होंने चाँद से सामग्री वापस धरती पर भेजी है।
सैंपल वापस क्यों लाएं?
चाँद पर मौजूद कोई रोबोट सिर्फ उसी चीज़ का अध्ययन कर सकता है जो उसके ठीक सामने है। वहीं, धरती पर किसी लैब में रखे सैंपल का अध्ययन दशकों तक किया जा सकता है।
- धरती पर मौजूद लेबोरेटरीज़ चाँद पर भेजे जा सकने वाले किसी भी उपकरण से कहीं ज़्यादा पावरफुल होती हैं
- सालों बाद भी उसी सैंपल को बेहतर उपकरणों के साथ दोबारा टेस्ट किया जा सकता है
- दुनिया भर के रिसर्च ग्रुप्स के बीच इन सैंपल्स को शेयर किया जा सकता है
यह कैसे काम करता है?
चंद्रयान-4 कोई एक अंतरिक्ष यान नहीं है, बल्कि यह एक साथ काम करने वाले कई मॉड्यूल्स से बना है, जिन्हें दो रॉकेटों के ज़रिए लॉन्च किया जाएगा।
- एक लैंडर जो नीचे उतरेगा और सतह में ड्रिल करेगा
- एक असेंडर जो चाँद से सैंपल को उठाएगा
- एक ट्रांसफर मॉड्यूल जो सैंपल को चाँद की कक्षा में ले जाएगा
- एक री-एंट्री मॉड्यूल जो इसे धरती के वायुमंडल में सुरक्षित वापस लाएगा
सबसे मुश्किल काम लैंडिंग नहीं है। सबसे मुश्किल काम चाँद की कक्षा में रेंडेवू और डॉकिंग है, जहाँ एक अंतरिक्ष यान को बिना ज़मीन से किसी मदद के दूसरे यान को खोजना और उससे जुड़ना होता है।
यह मुश्किल क्यों है?
चाँद से कुछ भी वापस लाना वहाँ जाने से कहीं ज़्यादा मुश्किल है। इसके लिए चाँद की सतह से उड़ान भरने के लिए एक रॉकेट चाहिए, चाँद की कक्षा से बाहर निकलने के लिए दूसरे रॉकेट की ज़रूरत होती है, और लगभग 11 किलोमीटर प्रति सेकंड की स्पीड से वापस आते समय बचने के लिए एक बेहद मज़बूत हीट शील्ड की भी ज़रूरत होती है।
यह कब हो रहा है?
चंद्रयान-4 की योजना 2027 के आसपास की गई है। यह सीधे चंद्रयान-3 पर आधारित है, जिसने यह साबित कर दिया था कि भारत चाँद के दक्षिणी ध्रुव के पास सुरक्षित रूप से लैंड कर सकता है।
चंद्रयान-4 के बाद, यह प्लान जापान के साथ एक जॉइंट मिशन चंद्रयान-5 के साथ आगे बढ़ेगा, जो चाँद के ध्रुवों के पास पानी की बर्फ की खोज करेगा।








